नई दिल्ली/गुवाहाटी, 3 जुलाई। भारत में कृषि जैव विविधता के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण (एनआरएए) द्वारा वित्तपोषित ‘जंगली धान (ओरिज़ा रूफ़ीपोगोन) के यथास्थान संरक्षण एवं प्रबंधन’ परियोजना ने असम में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। इस परियोजना के तहत असम के सोनितपुर जिले के बोरजुली क्षेत्र को राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण द्वारा आधिकारिक रूप से ‘जैव विविधता धरोहर स्थल (Biodiversity Heritage Site)’ घोषित किया गया है। यह उपलब्धि भारत की प्राकृतिक धरोहर और कृषि आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जा रही है।
यह परियोजना वर्ष 2022 से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (आईसीएआर-एनबीपीजीआर), नई दिल्ली द्वारा असम राज्य जैव विविधता बोर्ड के सहयोग से संचालित की जा रही है। परियोजना का मुख्य उद्देश्य जंगली धान की दुर्लभ प्रजातियों की पहचान, संरक्षण, वैज्ञानिक अध्ययन तथा उनके आनुवंशिक गुणों का दस्तावेजीकरण करना है, ताकि भविष्य की कृषि आवश्यकताओं के अनुरूप इनका उपयोग किया जा सके।
हाल ही में आईसीएआर-एनबीपीजीआर के वैज्ञानिकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने एनआरएए के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. चंद्र शेखर कुमार (आईएएस) से मुलाकात कर परियोजना की प्रगति और उपलब्धियों की विस्तृत जानकारी साझा की। वैज्ञानिकों ने बताया कि जंगली धान के जर्मप्लाज्म के संरक्षण और अध्ययन के क्षेत्र में इस परियोजना ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है, जिसके परिणामस्वरूप बोरजुली क्षेत्र को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष संरक्षण का दर्जा मिला है।
इस अवसर पर डॉ. चंद्र शेखर कुमार ने अनुसंधान दल के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि जंगली धान की प्रजातियाँ भारत की अमूल्य आनुवंशिक धरोहर हैं। इनके माध्यम से भविष्य में ऐसी धान की नई किस्में विकसित की जा सकती हैं जो जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक सहनशील, अधिक उत्पादन देने वाली तथा बेहतर पोषण गुणवत्ता वाली हों। उन्होंने कहा कि बदलते जलवायु परिदृश्य में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस प्रकार के आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि जंगली धान की तरह अन्य फसलों के जंगली संबंधी पौधों के संरक्षण के लिए भी देशभर में इसी प्रकार की वैज्ञानिक और संस्थागत पहलें की जानी चाहिए। इससे भारतीय कृषि की जलवायु अनुकूलन क्षमता, दीर्घकालिक स्थिरता और खाद्य सुरक्षा को और अधिक मजबूती मिलेगी।
बैठक में एनआरएए के निदेशक (कृषि एवं उद्यानिकी) डॉ. पंकज कुमार शाह तथा तकनीकी विशेषज्ञ (जलागम प्रबंधन) डॉ. अनिल कुमार मिश्रा भी उपस्थित रहे। विशेषज्ञों ने इस परियोजना को भविष्य की टिकाऊ कृषि व्यवस्था और जैव विविधता संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बोरजुली क्षेत्र को जैव विविधता धरोहर स्थल का दर्जा मिलने से न केवल जंगली धान की दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण सुनिश्चित होगा, बल्कि भारत को जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के अनुरूप उन्नत और टिकाऊ कृषि प्रणाली विकसित करने में भी महत्वपूर्ण सहायता मिलेगी।






