नई दिल्ली, 29 अगस्त 2026। आर्थिक संसाधनों की कमी अक्सर प्रतिभाशाली विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए उच्च शिक्षा की राह में बड़ी चुनौती बन जाती है। ऐसे में समय पर मिलने वाली छात्रवृत्ति और फेलोशिप न केवल आर्थिक बोझ कम करती है, बल्कि शोधार्थियों को अपने लक्ष्य पर पूरी एकाग्रता के साथ आगे बढ़ने का अवसर भी देती है। तमिलनाडु के डिंडीगुल की 32 वर्षीय डॉ. जानकी सुंदरराजन की कहानी इसका प्रेरक उदाहरण है।
अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों के लिए राष्ट्रीय फेलोशिप (NFSC) से मिली सहायता के माध्यम से डॉ. जानकी ने आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद अपनी पीएचडी पूरी की और अब अध्यापन एवं अनुसंधान के क्षेत्र में अपना करियर आगे बढ़ा रही हैं।
आर्थिक चुनौतियों के बीच जारी रखा पीएचडी का सफर
डॉ. जानकी सामान्य आर्थिक पृष्ठभूमि वाले परिवार से आती हैं। परिवार में शिक्षा को हमेशा महत्व दिया गया और उन्हें उच्च शिक्षा के लिए लगातार प्रोत्साहन मिला, लेकिन पूर्णकालिक शोध के दौरान होने वाले खर्चों को पूरा करना परिवार के लिए आसान नहीं था।
वर्ष 2019 से 2024 के बीच अपनी पीएचडी के दौरान उन्हें शोध सामग्री, डिजिटल संसाधनों, डेटा संग्रह, क्षेत्रीय अध्ययन, शैक्षणिक यात्राओं, सम्मेलनों और शोध पत्रों के प्रकाशन जैसे कार्यों के लिए आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
पूर्णकालिक शोधार्थी होने के कारण नियमित आय का कोई स्थायी साधन नहीं था। ऐसे में आर्थिक दबाव का सीधा असर उनके शोध कार्य पर पड़ रहा था।
सितंबर 2019 में मिली NFSC फेलोशिप
डॉ. जानकी के लिए महत्वपूर्ण बदलाव सितंबर 2019 में आया, जब उन्हें NFSC योजना के तहत फेलोशिप मिलनी शुरू हुई। इसके अंतर्गत उन्हें ₹35,000 प्रति माह की वरिष्ठ अनुसंधान फेलोशिप प्राप्त हुई।
इस नियमित आर्थिक सहायता ने उनकी शोध यात्रा को स्थिरता प्रदान की और उन्हें पीएचडी के दौरान आने वाले विभिन्न खर्चों को व्यवस्थित तरीके से पूरा करने में मदद मिली।
शोध सामग्री से लेकर डेटा कलेक्शन तक में मिली मदद
फेलोशिप की राशि का उपयोग उन्होंने अपने शोध से जुड़े विभिन्न कार्यों में किया। इसमें शोध सामग्री खरीदना, इंटरनेट और डिजिटल संसाधनों का उपयोग, डेटा संग्रह, क्षेत्रीय अध्ययन, शैक्षणिक यात्राएं, सम्मेलनों में भागीदारी और प्रकाशन संबंधी गतिविधियां शामिल थीं।
आर्थिक दबाव कम होने के बाद डॉ. जानकी अपने शोध पर पहले की तुलना में अधिक एकाग्रता के साथ काम कर सकीं। इससे उनके आत्मविश्वास में भी वृद्धि हुई और उन्होंने बिना किसी बड़ी आर्थिक रुकावट के अपनी डॉक्टरेट की पढ़ाई पूरी की।
शिक्षक शिक्षा और डिजिटल एजुकेशन पर रहा फोकस
डॉ. जानकी का शैक्षणिक रुचि क्षेत्र शिक्षक शिक्षा, डिजिटल शिक्षा और उच्च शिक्षा संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान से जुड़ा रहा है।
उनका लक्ष्य केवल पीएचडी की डिग्री हासिल करना नहीं था, बल्कि शिक्षा और शोध के क्षेत्र में एक समर्पित शिक्षाविद के रूप में योगदान देना था। फेलोशिप ने उनके इसी लक्ष्य को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अब गांधीग्राम ग्रामीण संस्थान में कर रहीं अध्यापन
पीएचडी पूरी करने के बाद डॉ. जानकी ने अपने अकादमिक करियर की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया। वह वर्तमान में गांधीग्राम ग्रामीण संस्थान (डीम्ड विश्वविद्यालय) में अतिथि शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं।
इस तरह NFSC फेलोशिप से मिली आर्थिक सहायता ने उन्हें केवल पीएचडी पूरी करने में ही मदद नहीं की, बल्कि अध्यापन और अनुसंधान के क्षेत्र में पेशेवर करियर बनाने का आधार भी मजबूत किया।
डॉ. जानकी बोलीं- फेलोशिप ने दिया आर्थिक स्थिरता का भरोसा
फेलोशिप के प्रभाव को लेकर डॉ. जानकी ने कहा कि NFSC फेलोशिप ने उन्हें आर्थिक स्थिरता प्रदान की और बिना किसी रुकावट के पीएचडी शोध जारी रखने का आत्मविश्वास दिया।
उनके अनुसार, इस सहायता से परिवार पर आर्थिक बोझ कम हुआ और वह अपने शोध, शोध पत्र प्रकाशन तथा पेशेवर विकास पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकीं। इससे अध्यापन एवं अनुसंधान के क्षेत्र में करियर बनाने की उनकी राह भी मजबूत हुई।
फेलोशिप बनी आत्मनिर्भरता और अकादमिक सफलता की सीढ़ी
डॉ. जानकी सुंदरराजन की यात्रा बताती है कि उच्च शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता किसी प्रतिभाशाली शोधार्थी के भविष्य को किस तरह बदल सकती है। आर्थिक संसाधनों की कमी के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया और फेलोशिप के सहयोग से अपनी पीएचडी पूरी की।
आज वह शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में अपना योगदान दे रही हैं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि उचित अवसर, आर्थिक सहयोग और दृढ़ संकल्प मिलकर शैक्षणिक सपनों को वास्तविकता में बदल सकते हैं।





