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‘भारत डिस्कोर्सेस ऑन वाटर @2047’ में नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं ने साझा किए समाधान; पारंपरिक जल प्रणालियों से लेकर आधुनिक तकनीक और ग्रीन फाइनेंस तक पर हुई चर्चा

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अहमदाबाद, 25 अगस्त। भारत को वर्ष 2047 तक जल-सुरक्षित और विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में जल संरक्षण, जल प्रबंधन और जनभागीदारी को लेकर अहमदाबाद में दो दिवसीय राष्ट्रीय संवाद आयोजित किया गया। ‘भारत डिस्कोर्सेस ऑन वाटर @2047’ नाम से आयोजित इस सम्मेलन में पहली बार गुजरात में जल, पर्यावरण और सामुदायिक विकास से जुड़े पांच पद्म पुरस्कार विजेता एक ही मंच पर जुटे।

उद्गम चैरिटेबल ट्रस्ट, गांधीनगर ने सेंटर फॉर वाटर पीस (CWP), डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन (SPMRF) और I-HUB के सहयोग से इस राष्ट्रीय संवाद का आयोजन किया। अहमदाबाद के KCG ऑडिटोरियम में हुए सम्मेलन में नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, जल विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं, स्टार्टअप प्रतिनिधियों और जमीनी स्तर पर जल संरक्षण के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।

जल केवल संसाधन नहीं, जीवन का आधार

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता पद्म भूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने की। गुजरात सरकार की शहरी विकास राज्य मंत्री दर्शनाबेन वाघेला मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गुजरात प्रांत के प्रांत कार्यवाह शैलेशभाई पटेल सहित अनेक गणमान्य लोगों ने भी कार्यक्रम में भाग लिया।

डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने जल संरक्षण के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि जल केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन की बुनियाद है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ‘हर व्यक्ति, हर समुदाय और सरकार को मिलकर पानी की हर बूंद बचाने की जिम्मेदारी उठानी होगी।’

पारंपरिक ज्ञान से आधुनिक तकनीक तक

सम्मेलन के पहले दिन ‘भारतीय जल ज्ञान’, ‘वाटर सर्कुलैरिटी’ और ‘जनभागीदारी इन एक्शन’ जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई।

विशेषज्ञों ने भारत की पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों-जोहड़, बावड़ी, कुंड और अन्य स्थानीय जल संरचनाओं की उपयोगिता पर चर्चा की। साथ ही इस बात पर मंथन किया गया कि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान, तकनीक और शोध के साथ जोड़कर जल संकट का प्रभावी समाधान कैसे तैयार किया जा सकता है।

‘वाटर सर्कुलैरिटी’ सत्र में पानी के पुन: उपयोग, रिसाइक्लिंग, कुशल जल प्रबंधन और कम से कम पानी में अधिकतम उपयोग जैसे विषयों पर चर्चा हुई। वहीं ‘जनभागीदारी’ सत्र में देश के विभिन्न हिस्सों में समुदायों द्वारा चलाए जा रहे जल संरक्षण के सफल मॉडलों को सामने रखा गया।

विश्वामित्री नदी के उदाहरण से शहरी बाढ़ प्रबंधन पर चर्चा

गुजरात सरकार के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा आयुक्त दिलीप राणा, IAS ने विश्वामित्री नदी से जुड़े कार्यों और वडोदरा में बाढ़ की समस्या से निपटने के लिए किए गए प्रयासों पर अपने अनुभव साझा किए।

उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक योजना, समयबद्ध हस्तक्षेप और विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय के जरिए शहरी जल प्रणालियों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। विश्वामित्री नदी का उदाहरण शहरी क्षेत्रों में जल प्रबंधन और बाढ़ जोखिम कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण सीख के रूप में सामने आया।

अदालज की बावड़ी में दिखी भारत की जल विरासत

सम्मेलन के दौरान शोध और नवाचार पर आधारित पोस्टर प्रदर्शनी भी लगाई गई। इसके बाद प्रतिभागियों ने अदालज की बावड़ी (Adalaj ni Vav) का तकनीकी एवं अध्ययनात्मक दौरा किया।

यहां प्रतिभागियों ने भारत की प्राचीन जल वास्तुकला, भूजल संरक्षण और रिचार्ज की पारंपरिक तकनीकों तथा स्थानीय समुदायों की जल प्रबंधन प्रणालियों को समझा। अदालज की बावड़ी इस बात का उदाहरण है कि भारत में सदियों पहले भी जल संरक्षण को वास्तुकला, संस्कृति और सामुदायिक जीवन से जोड़ा गया था।

समुदाय की भागीदारी के बिना जल संरक्षण अधूरा

पद्म श्री उमाशंकर पांडे ने जल संरक्षण में सामुदायिक स्वामित्व और पारंपरिक ज्ञान की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जब स्थानीय लोग अपने जल स्रोतों को अपना संसाधन मानकर उनकी जिम्मेदारी लेते हैं और पारंपरिक प्रणालियों को पुनर्जीवित करते हैं, तब जल संरक्षण एक वास्तविक जनआंदोलन बन सकता है।

यही विचार सम्मेलन के विभिन्न सत्रों में भी प्रमुखता से सामने आया कि जल संकट का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। इसके लिए गांव, शहर, परिवार, संस्थान और आम नागरिक सभी को जिम्मेदारी साझा करनी होगी।

दूसरे दिन शोध, नीति और तकनीकी नवाचार पर जोर

सम्मेलन के दूसरे दिन चर्चा का केंद्र नीति, शोध, तकनीक और क्रियान्वयन रहा।

‘जल चुनौतियों से राष्ट्रीय अवसरों तक: भारत @2047 के लिए शोध, नवाचार और रास्ते’ विषय पर आयोजित शोध संवाद में जल सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने में वैज्ञानिक शोध और नवाचार की भूमिका पर चर्चा हुई।

वहीं ‘जल शासन, सार्वजनिक नीति और जल-सुरक्षित भारत की दिशा’ विषयक सत्र में केंद्र और राज्य सरकारों, संस्थानों, शोधकर्ताओं तथा समुदायों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

हर बूंद के लिए इनोवेशन पर चर्चा

‘Innovation for Every Drop’ सत्र में जल संरक्षण में स्टार्टअप और नई तकनीकों की भूमिका पर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने जल की निगरानी, कुशल उपयोग, पुनर्चक्रण, स्मार्ट जल प्रबंधन और आधुनिक तकनीकी समाधानों को बड़े पैमाने पर लागू करने की संभावनाओं पर विचार साझा किए।

इसके साथ ही ग्रीन फाइनेंस और जलवायु-अनुकूल जल प्रणालियों पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि जल से जुड़े बुनियादी ढांचे, संरक्षण परियोजनाओं और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने वाली योजनाओं के लिए दीर्घकालिक और टिकाऊ निवेश जरूरी है।

जल सुरक्षा को विकास से जोड़ने की जरूरत

पद्म श्री भारत भूषण त्यागी ने जल सुरक्षा को आने वाली पीढ़ियों के भविष्य में निवेश बताया। उन्होंने कहा कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन जरूरी है तथा हर समाधान ऐसा होना चाहिए जो प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के साथ स्थानीय समुदायों को भी मजबूत करे।

पद्म श्री सतपाल सिंह ने भी जल संरक्षण को जनजीवन का हिस्सा बनाने पर जोर दिया। उनके अनुसार जब प्रत्येक गांव, परिवार और समुदाय पानी को साझा जिम्मेदारी के रूप में देखेगा, तभी स्थायी परिवर्तन संभव होगा।

विकसित भारत के लिए जल सुरक्षा जरूरी

उद्गम चैरिटेबल ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी डॉ. मयूर जोशी ने कहा कि ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य जल सुरक्षा के बिना पूरा नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकारों और संस्थानों की नहीं है, बल्कि समुदायों, शोधकर्ताओं, नवाचारकर्ताओं और प्रत्येक नागरिक को मिलकर काम करना होगा।

उनके अनुसार चिंता को सामूहिक कार्रवाई में बदलना ही जल संकट से निपटने का सबसे प्रभावी रास्ता है।

‘भारत वाटर मैनिफेस्टो 2047’ की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

दो दिवसीय सम्मेलन में सामने आए विचारों और सिफारिशों को प्रस्तावित ‘भारत वाटर मैनिफेस्टो 2047’ के लिए उपयोगी माना जा रहा है। इसका उद्देश्य जल संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना, नीतियों को दिशा देना और जल सुरक्षा के लिए सामूहिक प्रयासों को मजबूत करना है।

समापन सत्र में IIT दिल्ली के सेंटर फॉर रूरल डेवलपमेंट एंड टेक्नोलॉजी के निदेशक डॉ. विवेक कुमार ने ‘भारत डिस्कोर्सेस ऑन वाटर’ के दायरे को और व्यापक बनाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने जल से जुड़े मुद्दों को पर्यावरण, ग्रामीण विकास, शहरीकरण, कृषि और अन्य महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विषयों के साथ जोड़कर समग्र दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया।

गंगा समग्र के क्षेत्र प्रचारक अमरीश कुमार ने भी जल संरक्षण को सामूहिक और पवित्र जिम्मेदारी बताते हुए लोगों से इसमें सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया।

सेंटर फॉर वाटर पीस के CMD संजय कश्यप ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए सभी हितधारकों से इस पहल से जुड़े रहने और अपनी क्षमता के अनुसार जल संरक्षण के अभियान को आगे बढ़ाने की अपील की।

संदेश स्पष्ट:जल संरक्षण अब विकल्प नहीं, सामूहिक जिम्मेदारी

अहमदाबाद में आयोजित ‘भारत डिस्कोर्सेस ऑन वाटर @2047’ ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि 2047 तक जल-सुरक्षित भारत का निर्माण केवल सरकारी नीतियों से नहीं, बल्कि सरकार, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, उद्योग, स्टार्टअप, समुदायों और आम नागरिकों की साझी भागीदारी से होगा।

भारत की सदियों पुरानी जल संरक्षण परंपराओं को आधुनिक विज्ञान और तकनीक से जोड़कर यदि व्यापक स्तर पर लागू किया जाए, तो जल संकट से निपटने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण विकास और सतत आर्थिक विकास को भी नई गति मिल सकती है।

जल की हर बूंद बचाना ही आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य में सबसे बड़ा निवेश है।

G.D.PANDA

G.D. Panda is the Founder & Editor-in-Chief of GDP News (www.gdpnews.in), which he leads and manages with a clear focus on credible journalism and insightful news analysis. With 20+ years of experience in media, journalism, and ground reporting, he brings strong expertise in Finance, Economics, Current Political Affairs, and contemporary issues. Known for his sharp analytical perspective, extensive field experience, and commitment to responsible journalism, he has established himself as a credible and well-informed media personality, while also actively contributing to society as a dedicated social worker.

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