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JEE-NEET की रेस में पीछे छूट रहा बचपन, रिजल्ट के नाम पर क्यों घबराने लगते हैं बच्चे?

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Academic Stress in India: फेल होने का डर और सोसाइटी का प्रेशर- क्या भारत में बच्चों का भविष्य यही है? भारत में स्टूडेंट्स की आत्महत्याओं के डराने वाले आंकड़ों के बीच एजुकेशन एक्सपर्ट ने बताया कि क्यों अब हर स्टूडेंट को एक गुरु और सही गाइडेंस की सख्त जरूरत है.

नई दिल्ली (Academic Stress in India). भारत में परीक्षा का रिजल्ट सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि कई बच्चों के लिए जीने-मरने का सवाल बन जाता है. आईसी3 इंस्टिट्यूट की रिपोर्ट ‘स्टूडेंट सुसाइड : एन एपिडेमिक स्वीपिंग इंडिया’ के अनुसार, 2023 में करीब 14 हजार स्टूडेंट्स ने अपनी जान दे दी. इसका मतलब है कि देश में जितने भी लोग आत्महत्या कर रहे हैं, उनमें से 8% से ज्यादा स्कूल और कॉलेज के छात्र हैं. पिछले 10 सालों में स्टूडेंट सुसाइड के मामलों में 65% की भारी बढ़ोतरी हुई है.

इस रिपोर्ट से समझ में आता है कि इंडियन एजुकेशन सिस्टम सफलता के नाम पर बच्चों पर उम्मीदों का ऐसा बोझ डाल रहा है, जो उनकी जान तक ले रहा है. जब सालभर में 2,000 से ज्यादा बच्चे सिर्फ इसलिए खुदकुशी कर लें कि वे परीक्षा में फेल हो गए तो समझ लीजिए कि गलती बच्चों की नहीं, बल्कि समाज और सिस्टम की है. मेंटोरिया के फाउंडर और सीईओ निखार अरोड़ा का कहना है कि यह सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की हार है.

भारत में Mentorship को ‘सिस्टम’ का हिस्सा बनाना क्यों जरूरी है?

एक्सपर्ट निखार अरोड़ा का कहना है कि करियर काउंसलर के तौर पर उन्होंने 9वीं-10वीं के छोटे बच्चों को अपनी पसंद मारकर समाज और परिवार के दबाव में फैसले लेते हुए देखा है. वे इसी उलझन में घुटते रहते हैं कि आगे की पढ़ाई के लिए कौन से विषय चुनें. उनका मानना है कि जब तक बच्चों को सही गाइडेंस देकर नंबर की रेस से निकालना जरूरी है. अब वक्त आ गया है कि स्कूलों में Mentorship को सिर्फ नाम के लिए नहीं, बल्कि बच्चों की जिंदगी बचाने वाले जरूरी सिस्टम के तौर पर लागू किया जाए.

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